गांव की देहाती विधवा माँ की चुदाई

मेरा नाम विष्णु है और मैं मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव का रहने वाला हूं। मेरी उम्र अभी 19 साल की है और मेरी माँ जिनकी उम्र अभी 40 साल है। मेरी माँ एक देहाती गवार किस्म की कम पढ़ी लिखी औरत है।

वैसे मेरी माँ दिखने में गोरी चिट्ठी है उसका कद यही कोई 5 फुट 5 इंच तक होगा। उसका शरीर थोड़ा हरा भरा हुआ है। मेरी माँ का फिगर 38-36-42 है। मेरी माँ दिखने में एक दम माल लगती हैं बड़ी सी उभरी हुई गांड, पूरी तरह से फुली दुधदार छातियां और पेट पर हल्की सी चर्बी और बहुत ही सेक्सी दिखने वाली गहरी नाभी कुल मिलाकर मेरी माँ एक कामुक औरत दिखती है।

गांव की देहाती विधवा माँ की चुदाई

हम एक छोटे से गांव में रहते है। जहां की आबादी बहुत ही कम है। मेरी माँ बहुत ही कम उम्र में विधवा हो गई थी। मेरे पिता के मरने के बाद हमारे सर से साया उठ गया था। लेकिन फिर भी मेरी माँ ने अकेले मेरी परवरिश की मेरी माँ ने गाय भैंस का दूध बेचकर मुझे पढ़ाया लिखाया और उन्ही दूध के पैसों से हमारा घर भी चलता था।

उन्ही समय बीतता गया माँ की लगन से हमारे पास ढेर सारी गाय और भैंसे हो गई। अब मैं 19 साल का हो चुका था और मेरी माँ 40 की हो गई थी। वो दिनभर गाय भैंस के पीछे इतनी बिजी रहती थी की मेरी माँ अपना खुद का ख्याल रखना भूल चुकी थी।

मेरी माँ दिनभर गाय भैंस के गोबर साफ करने और उनकी देखरेख करने में लगाती थी। इससे पहले मुझे कभी मेरी माँ के बारे में कोई गंदा ख्याल नही आया था। एक दिन की बात है मैं उस दिन घर पर ही था। मेरी मां उस वक्त कुदाल से जानवरों के गोबर को साफ कर रही थी। तभी मुझे ख्याल आया की क्यों न मैं माँ की मदद करू।

मैं माँ के पास उसकी मदत्त करने के ईरादे से गया तो देखा की मेरी माँ ने अपनी साड़ी को अपनी जांघों तक उठाकर अपनी कमर में खोंस रखा था और अपने पल्लू को भी हटाकर अपनी कमर में खोंस रखा था। ताकि उनकी साड़ी में गोबर न लग जाए। उस वक्त मुझे माँ की मोटी मोटी जांघों को देखकर अजीब सा लगने लगा।

मेरे मन में एक अजीब सी हलचल मचने लगी। मेरी माँ की नंगी मंसल टांगें मुझे कामुक कर रही थी। उस वक्त पता नही मुझे क्या हुआ मैं माँ के पीछे बैठ गया और गोबर हटाने का नाटक करने लगा। जब मेरी माँ झुककर गोबर साफ कर रही थी। तब मेरी नजर अपने आप माँ की दोनों टांगों के बीच चली गई और मैं माँ के पीछे बैठकर चोरी चोरी उनकी टांगों के बीच झांकने की कोशिश करने लगा।

जब मेरी नज़र माँ की दोनों जांघों के बीच गई तो मुझे अंधेरा अंधेरा सा दिखा जब मैंने दुबारा माँ की जांघों के बीच देखा तो मुझे माँ बुर की झांटे दिख गई उतने में ही मेरा गला सूखने लगा। फिर मैंने सोचा की मैं कुछ गलत तो नहीं कर रहा हू। न जानें क्यों फिर से मेरी नज़र माँ की जांघों के बीच चली गई।

मैं अपनी माँ के जांघों के बीच छुपे खज़ाने को अपनी नजरों से ढूंढने लगा। उसकी जांघों के बीच अंधेरा था मुझे उसकी झांटे तो दिख रही थी। मगर और कुछ साफ साफ नहीं दिख रहा था। उस वक्त मेरे लिए माँ की झांटे देखना ही काफी था। मेरा लंड अब टाईट हो चला था।

मैं वहां से तुंरत घर के पीछे के खेत जो की तीनों तरफ बाड़ से घिरे हुए थे वहा गया और तुंरत अपना लंड निकाल कर मुट्ठ मारने लगा।  मेरे लंड का साइज़ 8 इंच था और मोटाई करीब 4 इंच और मेरा लंड बचपन से ही किसी केले की तरह टेढ़ा था। ये तो मुझे आज तक नही समझ आया की ये मेरी शारीरिक कमी है या मेरा जेनेटिक प्रोब्लम है।

मैं माँ की काली काली झांटों को याद करके खेत में ही मुट्ठ मारने लगा। अपने मन में माँ की बुर की एक छवि तैयार करके अपना लंड हिलाने लगा। कुछ ही देर में मेरा लंड पूरा खाली हो गया और मेरा वीर्य खेत की मिट्टी से मिल गया।

अंधेरा हो चला था। मैं और माँ एक साथ बिस्तर पर लेटे हुए थे। माँ चैन से बांई तरफ करवट लेकर सोई हुई थी। मैं घर की छत को देखते हुए माँ की बुर देखने की लालसा के साथ उनके बुर के सपने देखने लगा। मुझे नींद नहीं आ रही आधी रात ये सोंचते हुए बीत गई की कैसे मुझे अपनी माँ के बुर के दर्शन होंगे।

मैं यूं ही करवट बदल रहा था। मेरी आंखों की नींद उड़ चुकी थी। रात के 2 बजे जो मैंने देखा उससे मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। माँ सीधी होकर लेटी हुई थी और उनकी साड़ी लगभग उनके घुटनों तक उठी हुई थी। उनकी टांगें घुटनों से मुड़ी हुई और एक दूसरे से दूर फैली हुई थी।

मैं उठकर बैठ गया और मैंने देखा माँ के दोनों टांगों के बीच साड़ी टंगी हुई थी। जिससे मुझे उनकी दोनों जांघों के बीच का अंधेरा साफ दिखाई पड़ रह था। मैंने अपनी माँ के चेहरे की ओर देखा वो चैन से सोई हुई थी। उनकी चूंचियां उनके ब्लाउज़ के दबाव के कारण आधी ब्लाउस के गले के बाहर आ चुकी थी।

मुझे उनकी आपस में दबे हुए दोनों चूचियों के उभार साफ़ दिख रहे थे। माँ की चूंचियां देखते ही मेरा लंड फिर खड़ा हो गया। मैंने हौले से अपनी पैंट से अपना मोटा तगड़ा केले की तरह टेढ़ा लंड निकाला और माँ के दोनों जांघों के बीच के गुप्त अंधेरे में झांकने की कोशिश करने लगा।

मुझे उनकी जांघों के बीच कुछ साफ दिखाई नही पड़ रहा था। तो मैंने उनकी साड़ी को उनके घुटनों से थोड़ा उपर उनकी जांघों तक किया तो मुझे माँ की दोनों जांघों का कुछ हिस्सा साफ दिखने लगा। पर अभी भी मुझे उनकी बुर नही दिखाई पड़ी थी। तो मैंने हिम्मत की  और थोड़ा सा माँ की साड़ी को उनकी जांघों पर चढ़ाया।

अब मुझे माँ की काली काली झांटे साफ़ दिखने लगी और जब मैंने गौर से देखा तो मुझे माँ की बुर की गुलाबी चमड़ी दिखाई दी। उसकी बुर की छेद हल्की सी खुली हुई थी मगर झांटों के बीच छिपी हुई थी। मैंने माँ की दोनों टांगों को थोड़ा और फैलाया जिससे मेरी माँ की बुर की छेद और खुल गई।

माँ की बुर देखते ही मेरा लंड पानी छोड़ने लगा। मैंने अपना लंड पकड़ा और माँ की बुर को देखते हुए मुट्ठ मारने लगा। मैं माँ की बुर देखकर इतना  कामुक हो गया था की तुंरत मेरा लंड झटके खाने लगा और मैं झडने को आ गया। मेरे लंड ने वीर्य की धार छोड़ दी मगर मैंने अपनी उंगली से अपने लंड की छेद को दबा लिया।

मैंने अपना लंड माँ की बुर की छेद पर उनकी झांटों के उपर से ही सटा दिया और तुंरत अपने लंड की छेद पर से उंगली हटा दी। देखते ही देखते मेरे लंड का सारा वीर्य माँ की बुर की छेद पर निकल गया और उनकी बुर की छेद को ढकते हुए नीचे नीचे टपकने लगा। इसी तरह मैंने अपने लंड का सारा वीर्य माँ की बुर पर खाली किया।

जब मैंने अपना लंड माँ की बुर पर से हटाया तो देखा मेरा कुछ वीर्य माँ की बुर की छेद में अटका हुआ है और बाकी वीर्य माँ की बुर की झांटों में फंसा हुआ है। मुझे उस वक्त मेरी माँ बहुत सैक्सी देसी माल लग रही थी। मैं माँ की टांगों के तरफ से हट गया और उनकी सूरत देखने लगा।

तो मेरा ध्यान फिर से माँ की चुचियों पर गया मुझे माँ की नंगी बड़ी बड़ी चूंचियां देखने की इच्छा होने लगी। लेकिन मुझे थोड़ा अजीब और साथ में डर भी लग रहा था। माँ उस समय गहरी नींद में थी मैंने सोचा अगर माँ उनकी बुर को वीर्य से नहलाते वक्त नहीं जागी तो अब क्या जागेंगी।

मैंने अपने हल्के हाथ माँ के सीने पर रख दिया और काफी देर तक उनकी गरम चुचियों पर अपने हाथ सेकता रहा। जब मेरी माँ ने कोई हरक़त नही की तब मैंने अपने दोनों हाथों से माँ के ब्लाउज़ के बटनो को एक एक करके खोलने लगा। मेरी माँ का ब्लाउज़ खुलते ही मेरे सामने उनकी वो गोरी और बड़ी चूंचियां लचकती हुई झूलने लगी।

उनकी नंगी चूचियों को देखकर मेरे मूंह में पानी आने लगा साथ ही मैं बहुत घबराने लगा। लेकिन उस वक्त मैं कामवासना में अंधा हो चुका था। मैंने अपना चेहरा माँ की चुचियों से सटा लिया और उनकी चुचियों को हल्के होठों के दबाव से चूमने लगा। आखिरकार मेरा मुंह अपने आप ही माँ के निप्पलों पर चला गया।

मैं माँ की काली गहरे रंग वाली मोटी निप्पलों को अपने जीभ से टक्कर मारने लगा। मुझे बहुत मजा आ रहा था फिर मैंने उनकी निप्पलों को बारी बारी से अपने मुंह में लेने लगा। मैं धीरे धीरे उनकी दोनों निपल्लो को चूसने लगा। अचानक से मेरे अंदर का जोश बढ़ गया और मैं माँ की निपल्लों से सख्ती करने लगा और अपने होठों से उनकी निप्पलों को जोर जोर से दबाने और खींचने लगा।

मैं ये भूल चुका था की वो सोई हुई है और मैं उनके साथ बिना उनकी अनुमति ये सब कर रहा हूं। मैं किसी बछड़े की तरह उनकी चुचियों को टक्कर मार मारकर उनकी निप्पलों को अपने होठों से मसल रहा था। अचानक माँ की नींद खुल गई और उन्होंने जब मुझे उनकी नंगी चूचियों के साथ देखा तो तुंरत मुझे धकेलने लगी।

लेकिन मैं किसी ज़िद्दी बछड़े की तरह उनकी चुचियों पर से नही हटा माँ ने मेरे बालों को अपनी मुट्ठी में कस रखा था। मुझे अपनी चुचियों पर से हटाने की जीतोड़ कोशिश कर रही थी। माँ मेरे बालों को खींचते हुए कह रही थी की हट जा क्या कर रहा है अब तू बच्चा नहीं है जो मेरा दूध पी रहा है। हट जा विष्णु हट जा नही तो मारूंगी।

लेकिन मैं कामवासना में इतना उत्तेजित हो गया था की माँ का मेरी सर के बालों का नोचना मुझे गुस्सा दिला रहा था। मैंने आव न ताव देखा मैंने माँ की जांघों तक आई साड़ी को पकड़ा और एक झटके में ही उनकी कमर तक उठा दिया। अब माँ को एहसास हो चुका था की मैं उनके साथ क्या करने वाला हूं। मैं जब माँ की चुचियों को चूस रहा था वो उस समय मेरी बचकानी हरकत समझ रही थी और ज्यादा खुलकर विरोध नहीं कर रही थी।

लेकिन अब जब मैंने उनकी साड़ी को उनकी कमर तक उठा दिया और उनकी आबरू उतार दी। तो उनकी आंखों में थोड़ी लजा के साथ ज्यादा विरोध दिखने लगा। वो मेरा विरोध करने लगी और मेरे सर के बालों को अपनी दोनों मुट्ठी से नोचते हुए उठने की कोशिश करने लगी। लेकिन बार बार मैं उन्हें बिस्तर पर दबा दे रहा था। वो अपने पैर चलाने लगी साथ ही अपनी बुर को अपनी साड़ी नीचे करके मेरी नजरों से ढकने की कोशिश करने लगी।

लेकिन मैं उन्हें बार बार बिस्तर पर दबा दे रहा था। अभी भी मैं उनकी दोनों चुचियों के निप्पलों को बारी बारी से कस कसकर अपनी मुंह में दबाकर चूस रहा था। माँ ने एक हाथ से मेरे सर के बाल को पकड़ा और दूसरे हाथ से मेरे गालों पर थप्पड़ मारने लगी। वो रोनी सूरत बनाकर मुझे हटने को कह रही थी। उस वक्त उनका विरोध मुझे गुस्सा दिला रहा था।

अब मैंने सोच लिया की अब इस जंगली घोड़ी को नथ पहनाने का समय आ चुका है। मैंने एक हाथ से अपनी पैंट उतारी और अपना टेढ़े केले जैसा मोटा तगड़ा लंड पकड़ा और सीधा माँ की जांघों पर अपनी जांघें रखकर लेट गया। माँ और मेरे पैर एक दम सीधे और उनके पैर मेरे पैरों के नीचे थे। मैंने अपना लंड माँ की जांघों और बुर के बीच बने V आकार के हिस्से के बीच दबाया।

फिर अपनी कमर को माँ की कमर से चिपका लिया। कुछ ही पलों में मेरे और माँ के दोनों के मुंह से आह… निकली माँ के मुंह से निकली आह… उनकी चीख थी और मेरे मुंह से निकली आह मुझे सुकून देने वाली आवाज थी। माँ का मुंह खुला का खुला रह गया था। उनकी दोनों आंखों से आंसू के बूंद बाहर आ रहे थे ऊपर और निचले दांतों के बीच लार की पतली पतली तार बन गई थी।

इसका मतलब था की मेरा लंड माँ की बुर में घुस चुका था और उनको दर्द भी हुआ था। मैं माँ के खुले मुंह में अपने होठ भींगोने लगा। मैं माँ के होठों और जीभ को आपने मुंह में लेकर चूसने लगा और साथ ही अपने दोनों पंजों से माँ की दोनों बड़ी बड़ी चुचियों को मसलने लगा।

अब माँ की चूंचियां लाल हो चुकी थी। अब मैं अपना चेहरा उनकी गर्दन पर ले आया और उनकी गर्दन को चूमते हुए अपनी कमर को थोड़ा थोड़ा उपर उठाकर अपना लंड उनकी बुर में धकेलने लगा। मैं उनकी गर्दन पर गरम गरम सांसें छोड़ रहा था। माँ कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी। न तो वो मेरा विरोध कर रही थी न ही उनकी बुर में घुसते हुए लंड से उन्हें कोई फर्क पड़ रहा था।

वो मेरे नीचे एक बेजान पुतले की तरह पड़ी हुई थी और अपनी आबरू लुटते हुए मुझ जैसे लुटेरे को एक टक देख रही थी। जब मैंने उनके बदन में कोई हरकत नहीं देखी तो मैंने अपने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी। ताकि उनको तकलीफ़ हो और कम से कम वो कुछ बोले मैं अपना पूरा ज़ोर लगाकर अपनी जांघों और कमर को उनके कमर और जांघों पर पटक पटककर अपना लंड तेज़ी से उनकी बुर में डालने लगा।

कुछ देर पूरी ताक़त लगाकर उनकी बुर चोदने के बाद वो कराहने लगी। मुझे उनकी मुंह से निकलती कराह अच्छी लग रही थी। मैं अपना मुंह उनके गले पर रखकर उनके गले को चाटते हुए तेज़ी से उनकी बुर में धक्के मारने लगा। अब माँ के मुंह से कराहें और सिसकारियां निकल रही थी आह… इस्स्स…. आ ओ….आह्हह…. इस्स्श… आआह्ह्ह्ह…. साथ ही हमारे जांघों के टकराने की आवाज भी कमरे में गूंज रही थी।

आख़िरकार माँ ने धीरे धीरे अपनी टांगें खोलनी शुरू की और कुछ देर में अपनी दोनों टांगें फैला दी अब मैं उनकी दोनों टांगों के बीच आ चुका था। अब मेरा लंड शुरू से अंत तक माँ की बुर में घूस रहा था। उनकी टांगों के बीच जगह मिलने से मैं अच्छे से उनकी बुर चोदने लगा। कुछ देर चुदने के बाद माँ अपने दोनों हाथों से मेरी क़मर को छुने लगी।

कभी वो अपने हाथों का इस्तेमाल मेरे ज़ोरदार धक्कों के असर को करने में करती तो कभी वो दोनों हाथों से मेरी कमर को सहलाती। उनका मेरी कमर को सहलाना मेरे अंदर और ऊर्जा भर रहा था। मैंने अपना लंड माँ की बुर से चिपका लिया और बस अपनी क़मर आगे बढ़ा बढ़ाकर उनकी कमर को ठेलने लगा।

अब मेरा लंड माँ की बुर को बिना रगड़े उनकी बुर की चुदाई करने लगा। मैंने माँ के दोनों गालों को चूमना शुरू किया माँ भी अपने गालों को पलट पलटकर मुझसे अपने दोनों गालों को चुमवा रही थी। अब उनके दोनों हाथ मेरी पीठ पर थे वो मेरी पीठ सहला रही थी और उन्होंने अपनी दोनों टांगों को मेरी टांगों पर क्रॉस करके मेरी टांगों को दबा लिया था।

जब माँ ने मेरी टांगों को अपनी टांगों से दबा दिया तब मुझे उनकी बुर में धक्के मारने में आसनी होने लगी। मैंने माँ के दोनों गांड  हिस्से पकड़ लिए और अपनी पूरी ताकत लगाकर उनकी बुर को चोदने लगा। माँ मेरे धक्कों से बदहाल हो रही थी। लेकिन उसे मज़ा भी आ रहा था। वो मेरे गालों पर अपने गाल रगड़ रही थी। उसकी सांसें भारी होने लगी थी।

उसका एक हाथ मेरी पीठ सहला रहा था तो एक हाथ मेरी गांड को सहला रहा था। अचानक से माँ सीतकारने लगी और उसने अपना हाथ मेरी गांड से नीचे किया और मेरी गोटियों को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। फिर माँ ने मुझसे वो कहा जो मैं कभी सोच भी नही सकता था। माँ ने मेरी गोटियों को जकड़े हुए कहा विष्णु अंदर ही निकाल दे।

माँ अब झड़ चुकी थी। उनकी बुर गीली हो चुकी थी अब वो भी मुझे मेरी गालों और मेरी छातियों को चूम रही थी। माँ ने मेरी निप्पलों को चूसना शुरू किया। जिससे मैं ज्यादा उत्तेजित होने लगा और मैंने मेरी माँ के बुर में ही अपना माल निकाल दिया। मैं हाँफता हुआ माँ को बदन से लिपटकर उनके उपर लेट गया। मैं झड़ता हुआ भी माँ की बुर में धक्के मार रहा था।

माँ मेरा सर सहलाते हुए बोल रही थी “शान्त हो जा बच्चे शान्त हो जा” उसके बाद माँ ने मेरा लंड अपनी बुर से निकालकर बाहर किया और मेरे माथे को सहलाने लगी। उनका ये बर्ताव मुझे कन्फ्यूज कर रहा था। जब मेरे अंदर की चुदाई की आग शांत हुई तब मुझें माँ को देखकर पछतावा होने लगा। मैं उनके उपर लेटे हुए ही उन्हें कसकर अपनी बांहों में पकड़ा और कहा गलती हो गई माँ माफ कर दीजिए।

माँ ने कहा हां गलत तो हो गया है विष्णु लेकिन ये ज़रूरी था। मैं चौंक गया।
माँ ने कहा मैं जानती हूं तेरे अंदर औरत की भूख जाग उठी थी मैं समझ सकती हूं की तूने ये सब मजबूरी में आकर किया।
लेकिन बेटे सच बताऊं तो मुझे भी बहुत सालों बाद तूने औरत होने का सुख दिया है। मैं भी तेरा साथ देने को मजबूर हो गई थी। तूने मेरे अंग अंग को मस्त कर दिया। मैं कुछ देर के लिए हमारे रिश्ते को भूल गई थी और तुझे एक मर्द और खुदको एक प्यार के लिए तड़पती औरत की नजरों से देख रही थी और जग जानता है की एक बिस्तर पर नंगे मर्द और औरत के बीच क्या होता है।

इसलिए बेटे तू पछता मत ये हमदोनो की बराबर की गलती है। शायद अगर तू कभी मुझसे आपस में शारीरिक संबंध के लिए पूछता तो मैं कभी नहीं मानती। लेकिन तूने शुरुआत में मुझसे जबरदस्ती की और बाद में मैं खुद को रोक नहीं पाई और मैं अपनी मर्जी से तेरे साथ संबंध बनाने में तेरा साथ देने लगी। इसलिए मैं भी उतनी ही जिम्मेदार हूं जितना तू है।

आज से मैं तुझे छुट देती हूं। तेरा जब भी मन करें तू मेरे साथ संभोग कर सकता है। लेकिन मुझसे वादा कर की ये सब सिर्फ रात को ही होगा और महावारी के वक्त तू निरोध लगाकर ही मेरे साथ सम्बंध बनाएगा। फिर माँ ने कहा की अगर मैं सोई हुई रही तो तू मेरी नींद का फ़ायदा उठाकर मेरे साथ ये सब नहीं करेगा।

बेटा मैं ये सब तुझे इसलिए समझा रही हूं। क्योंकि मैं एक विधवा औरत हूं। अगर मैं कभी गलती से भी पेट से हो गई तो हमदोनों मुस्किल में पड़ जायेंगे। रिश्ते से हम माँ बेटे है लेकिन है तो नर और मादा ही न कही तेरा बीज मेरे अंदर ठहर गया तो… मैंने कहा माँ मैं समझ गया आपकी सारी बातें मानूंगा।

करीब एक घंटे तक हमारे बीच बात चलती रही उसके बाद मेरा मन फिर से चंचल होने लगा। मैंने अपनी एक उंगली माँ की बुर में डाल दी और अंदर बाहर करने लगा। माँ मुस्कुराती हुई बोली मेरे बेटे में बहुत ऊर्जा भरी पड़ी है। मैंने माँ को कहा माँ आज एक बार और करने दो ना!

माँ तुंरत मान गई और मैं तूरंत बिस्तर से नीचे उतर गया और माँ की दोनों टांगों को पकड़कर माँ को बिस्तर के किनारे तक खींच दिया। अब मैंने माँ की दोनों टांगों को आपस में चिपकाकर ऊपर उठा दिया और उनकी टांगों को अपने कंधे पर रखा दिया। माँ की दोनों टांगें आपस में चिपका होने के कारण उनकी बुर काफी ज्यादा टाईट हो चुकी थी।

मैंने अपना लंड अपनी मुट्ठी में लिया और माँ के बुर के मुहाने पर रगड़ने लगा। माँ चुदाई के खयाल से ही मस्त हो चुकी थी। अचानक मैंने अपना लंड माँ की टाईट बुर में डाल दिया। माँ एकदम से चीख पड़ी आआहह… इस्सस… ओह.. मैं माँ की टांगों को पकड़े अपना लंड माँ की बुर में डालने लगा।

मेरा लंड माँ की बुर की गुलाबी चमड़ी को रगड़ते हुए अंदर बाहर होने लगा। इस दौरान माँ की बुर सकरी होने लगी और मैंने भी अपने घुटने बिस्तर के किनारे जमा दिए और माँ की बुर में अपना लंड डाले हुए सवार हो गया और कूद कूद कर उनकी बुर का कचूमर निकालने लगा। माँ झड़ गई और साथ ही कुछ पलों बाद मैं भी झड़ने वाला था। तो मैंने माँ से पूछा की माँ कहा निकालू तो माँ ने कहा अभी कोई डर नहीं है।

मेरी बुर में ही निकाल दे। मैं भी तेरे लंड का गर्म पानी अपनी बुर में लेना चाहती हूं। मेरा सारा पानी माँ की बुर में ही निकल गया उसके बाद मैंने अपना मोटा लंड माँ की बुर से निकाला और हम दोनों ने एक दूसरे को अपनी अपनी बांहों में जकड़ लिया और बिस्तर पर नंगे लेट गए। मैं सारी रात माँ के फुली हुई दुधारू छातियों को चूसता रहा।

दोस्तों उस रात के बाद मेरी माँ मेरे लिए फ्री हो गई मैं हर रात माँ की बुर को चोदता हूं सिर्फ़ महीने के कुछ दिनों को छोड़कर अब वो मेरे लंड की आदि हो गई है। दोनों तरफ से चुदाई की बराबर आग लगती हैं। मैं रोज नए नए पोज़ और तरीके से माँ की बुर का सुख भोगता हूं। उम्मीद है आप सभी को मेरी ये कहानी पसंद आई होगी।

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